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अल्फ़ाज

  मैं लेखक नही, बतौर इंसान कहता हूँ। अपने कलेजे का अल्फ़ाज कहता हूँ।।
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  उसकी वो प्यारी से मुस्कान याद मुझे आज भी है उसका वो खिलखिला के हँसना याद मुझे आज भी है ऑटो में बैठ के लगाई थी जो मेहंदी मेरे पैंट में उसका दाग आज भी है।।
     लगी होगी बद्दुआ हमें भी किसी की। अनजाने न जाने कितनों के दिल तोड़े होंगे।।

सच्चा प्यार आसानी से नही मिलता!

  कोई मिल जाये उन जैसा, ये न-मुमकिन है मगर वो खोज ले हम जैसा,इतना आसान ये भी नही!

सुकून की तलाश में एक सच्चा आशिक़!

  दिल-ए-मोहब्बत सिर्फ एक से किया सिर्फ एक को ही ये दिल अपनाना चाहे चलते चलते थक गया है ये मुसाफिर ये भी किसी के बाहों का ठिकाना चाहे।

प्यार में झुकना जरूरी होता है

  थोड़ा हम कदम बढ़ाते है, थोड़ा सा आप बढ़ा लीजिये... हम झुक कर माफी मांगते है, हो सके तो मांफ कर दीजिए।

तेरी याद!!!

  तुझसे लिपट कर रोने की ख्वाइश है, बिछड़ जाने से पहले हा.. एक बार लौट आ, तू लौट आ, मेरे टूट जाने से पहले बतसूरत सा हो गया हूं, तेरे रूठ जाने के बाद आ मुझें महका दे, मेरे सूख जाने से पहले उलझनों में कट रही रातें मेरी, अब नींद कहाँ? हो सके तो बचा ले, मेरे खत्म हो जाने से पहले वक़्त है!,अवसर है!,मोहब्बत भी, बस तू आ जा.. कहीं वक़्त ही न निकल जाए, तेरे आने से पहले।।              ©सूरज सिंह